डॉगरिज जैसे मूलवृंत के साथ बगीचा बनाना एक नया सिद्धांत है। यह महाराष्‍ट्र, आंध्र प्रदेश और उत्‍तर कर्नाटक में काफी लोकप्रिय हो चुका है। डॉगरिज जैसे मूलवृंत का उपयोग किए जाने से लवणीयता और सूखे की दोहरी समस्‍याओं से निपटने में सहायता मिलती है। इसके अलावा, डॉगरिज मृदा में सूत्रकृमियों को नियंत्रित करने के साथ-साथ स्‍थापित कलमों को बेहतरीन पौषणिक सहायता प्रदान करता है।

ऐसे बगीचों की तुलना में, जिन्‍हें किसानों के मूलवृंतों के साथ उगाया गया है और जिनमें 1½ वर्ष में फल आने शुरू हो जाते हैं, मूलवृंत बगीचों में फल आने में 6 से 8 महीनों का अधिक समय लगता है, क्‍योंकि मूलवृंतों को पहले खेत में स्‍थापित किया जाता है और तब 6 महीनों के बाद उपयुक्‍त किस्‍म पर उसकी कलम लगाई जाती है। पहली फसल प्राप्‍त करने में इस प्रकार की देरी को रोका जाना संभव नहीं है, परंतु इस देरी की भरपाई तब पूर्ण रूप से हो जाती है जब कलमबद्ध बेल में फल आने लगते हैं। प्रमुख व्‍यय घटकों, जैसे कि गड्ढे खोदना, उर्वरक/खादों की लागत, प्रशिक्षण ढ़ांचा, ड्रिप प्रणाली और अन्‍य पादप संरक्षण रासायनिक पदार्थां आदि को ध्‍यान में रखते हुए, एक सफल मूलवृंत-बगीचा बनाने के लिए नर्सरी पादपों और कलम लगाने के प्रभारों के रूप में लगभग 6000 रूपये प्रति एकड़ का खर्चा अलग से होता है। जब मूलवृंत-बगीचों में फल आने शुरू हो जाते हैं, तब न केवल प्रति हैक्‍टे. उपज में 20 से 25% की वृद्धि होती है, अपितु गुणवत्‍ता में भी सुधार आता है। इसका एक उदाहरण यह है कि जिन बगीचों से यूरोपीय बाजार के लिए ताजे अंगूर प्राप्‍त करने की योजना बनाई जाती है, उनमें कुल उत्‍पाद की प्राप्ति लगभग 60-70% होती है। पारंपरिक रूप से उगाए गए बागानों में यह 40% तक कम हो सकती है। राल बनाने के लिए नियोजित उद्यानों में भी प्राप्ति, उन उद्यानों की तुलना में 20% अधिक है जिसमें बेल स्‍वत: ही उगती हैं।

उपरोक्‍त वास्‍तविकताओं के अलावा, मूलवृंत डॉगरिज ने इस वर्ष महाराष्‍ट्र और कर्नाटक, जहाँ की मानसून विफल रहने के कारण स्थिति काफी खराब हो गई थी, के अनेक अंगूर उत्‍पादक क्षेत्रों में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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